उम्र के इस पड़ाव में आया एक विचार,
कुछ कर जाऊं जिससे जीवन हो साकार
खाये, पिए और सो गए, ये भी कोई जीवन है?
जानवर तक तो ठीक है, पर मानव कर लिए मरण है
रेशम का कीड़ा भी जब मरता है,
तो छोड़ जाता है अपनी एक पहचान ।
ऐसा जीना, ऐसे ही मरना अब मुझे कबूल नहीं है ।
डोर सांसो की हो ख़तम,
उससे पहले जीने का मकसद मिल जाये ।
मरना तो है सबको एक दिन,
मरने से पहले कुछ ऐसा हो जाये
हो नाज़ लोगो को मुझ पर,
नाम मेरा ले तो उनके आँखो मैं आंसू आ जाये ।