बच्चों का पूर्ण विकास के कैसे करें
    बच्चे एक फूल के पौधे की तरह होते हैं, बीज बोने से पहले माली बगीचे की जमीन को अच्छी तरह से तैयार करता है। जमीन में उम्दा खाद, जैव उर्वरक डाल अपनी सिंचाई करता है जमीन के साथ-साथ वह बगीचे के वातावरण का भी पुरा ध्यान रखता है, उदाहरण स्वरूप वायु का तापमान, आद्रता, वर्षा की मात्रा आदि। अनुकुल वातावरण पौधे की पूर्ण वृद्धि एवं स्वास्थ्य के लिये सहायक सिद्ध होते हैं। एक समय आने पर पौधा सुंदर एवं स्वस्थ फुलों से खिल उठता है। जिस प्रकार माली बीज बोने से पूर्व ही जमीन की तैयारी शुरू कर देता है उसी प्रकार मां-बाप रूपी माली को भी अपने परिवार रूपी बगीचे में एक नया बच्चा रूपी पौधे के आगमनके पूर्व ही तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। जब जमीन पूरी तरह तैयार हो तभी माली उसमें बीज बोता है इसलिए जब पति-पत्नी बच्ची की पूरी जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार हो एवं परिवार में अनुकुल सहयोग मिले तब उन्हें बच्चा रूपी बीज उनके प्यारे बगीचे में बोना चाहिए। बीज बोने के बाद माली फल एवं खाद से उसका से उसका निरन्त सेचन करता रहता है। जब बच्चा रूपी बीज माता की कोख में प्र्रवेश करता है तब माता को सकारात्मक विचार एवं प्रेम से बच्चे का निरस्तर सेचन करते रहना चाहिए। अनुसंधान से ज्ञात हुआ है कि यदि गर्भावस्था में माता नकारात्मक विचार रखती है एवं वातावरण दुखदायी होता है तो उसका प्रभाव बच्चों के दिमाग पर पड़ता है। गर्भावस्था के समय पूरे परिवार में उपस्थित खुशियां शांति एवं सकारात्मक बातें, बच्चों को उमंग की तरंगे भेजती है।


    माली जानता है कि एक स्वस्थ एवं पूर्व विकसित पौधे के लिये उसे सर्वप्रथम पौधें की नींव मजबूत करनी होगी। जब बीज फुटता है एवं धीरे-धीरे पौधे का रूप लेने लगता है तब माली उसका पूरा ध्यान रखते हुए उसे हर प्र्राकृतिक आपदा एवं विपदा से बचाता है। वह जानता है कि यदि इस समय नींव मजबूत हो जायेगी तो पूर्ण विकसित हो पौधा हर तुफान एवं कठिनाई का सामना करने की क्षमता रख पाएगा। माता-पिता को बच्चे के पूर्ण विकास एवं उन्हें सफल स्वस्थ व आनन्दित वयस्क बनाने के लिये, उनकी नींव मजबूत करने पर ध्यान देना होगा। विज्ञान ने सिद्ध किया है कि बचपन में मनुष्य की जो मान्यता एवं सोच बनती है वह पूरे जीवन ध्यान न देने एवं न बदलने से उसके साथ रहती है।


    दिमाग के दो भा होते है, एक भाग तो ऐच्छिक(ब्वदबपवने उपदक) और दूसरा अनऐच्छिक है (ैनइ.बवदबपवने उपदक)। ऐच्छिक भाग के पास सोचने, समझने एवं निर्णय लेने की क्षमता होती है। मैं यह कहूॅंगी, मुझे यहां जाना है, यह ऐच्छिक दिमाग का काम है। अनऐच्छिक दिमाग के पास अपनी कोई समझ नहीं होती एवं वह ऐच्छिक दिमाग की तुलना में कई गुना शक्तिशाली एवं क्षमता युक्त होता है यदि ऐच्छिक दिमाग एक मिनट में दस हजार(10ए000) बातें जमा कर सोच पाता है तब अनैच्छिक दिमाग एक मिनट में दो लाख(2ए00ए000) बातें जमा कर सकता है। बचपन में हुई घटना, वार्तालाप, दुखद, सुखद अनुभवों का अनैच्छिक दिमाग एक भण्डार है। माता-पिता एवं परिवार को बच्चों के अनैच्छिक दिमाग में होने वाले प्रभाव को ध्यान रखकर प्रतिक्रिया देनी चाहिए।
बच्चों का पूर्ण विकास के लिये हमें निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए-


1.    कभी भी बच्चे की तुलना किसी दुसरे बच्चे एवं उनके स्वयं के भाई-बहन के साथ ना करें। उदाहरण स्वरूप- एक पौधे पर मंदार का फुल लगा है, एक दुसरे पौधे पर गुलाब का। दोनों अपनी-अपनी जगह सुंदर है एवं दोनों का अपना महत्व है हम कभी नहीं चाहते कि गुलाब के पौधे पर मंदार का फुल एवं मंदार के पौधे पर गुलाब के फुल खिलें। परंतु सदैव आशा रखते है कि दुसरे के बच्चों में जो गुण हैं वह हमारे बच्चों में भी हो। ऐसा क्यों? हर बच्चे का अपना गुण एवं महत्व होता है, हमें चाहिये कि अपने बच्चे में उपस्थित गुणों को विकसित करने पर ध्यान दें। तुलनात्मक बातें बच्चों के अनैच्छिक दिमाग में जमा हो जाती हैं एवं जीवन भर हीन भावना के शिकार रहते है। अधिक तुलना होने पर वह खुद को दुसरों से कमजोर महसुस करने लगते हैं एवं उनका आत्म-विश्वास कमजोर होता है।
2.    बचपन में जब बच्चे छोटे-छोटे निर्णय लेते है तभी वह बडे़ होकर अपने जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिये सक्षम बन पाते हैं। हमें बच्चों को बचपन से ही निर्णय लेने की कला सिखानी चाहिए। उदाहरण स्वरूप उन्हें अपना पसंदीदा खिलौना, कपडा, व्यंजन चुनने को कहें।


3.    मजाक से की गई अवहेलना एवं बातें भी बच्चों के अनैच्छिक दिमाग में जमा हो जाती है। बच्चों को काई भी उपना देने से पहले अनैच्छिक दिमाग में होने वाले प्रभाव के बारे में सौचें। उदाहरण यह तो पागल है, तुम कोई काम पूरा नहीं करती हो, यह तो ऐसा ही है-चिड़चिड़ा एवं लडाई करने वाला,इत्यादि।


4.    बच्चों की छोटी-छोटी गलतियों पर उन्हें माफ करें, जब आप उन्हें माफ करते है तभी व पूर्व विकसित होकर अपने आप एवं दूसरों को माफ कर पाते है। उदाहरण - बच्चे के हाथ से चाय गिर गई एवं फर्श खराब हो गया इस पर हम बच्चों को जोर से चिल्लाते हुए लापरवाह कहते है एवं कुछ लोग कई देर तक डॉटते रहते है। हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए फर्श तो साफ किया जा सकता है लेकिन बच्चे के अनैच्छिक दिमाग पर जो लापरवाह खुद को लापरवाह समझने का भाव अंकित हो गया है वह नहीं हटाया जा सकता। यह अब बडे़ होने के बाद किस रूप् में प्रकाश होता है उसकी हम कल्पना भी नहीं ंकर सकतें।


5.    बच्चों के लिए उनके माता-पिता ही दुनिया को देखने का आईना होते है एवं वह उनकी नजर से सभी को देखते व समझतें हैं। घर एवं बाहर होने वाली हर घटना वं प्रतिक्रिया बच्चों के अनैच्छिक दिमाग में जमा हो जाती है। इसलिये आप उनके सामने ऐसी ही प्रतिक्रिया दे जो आप चाहते है कि वह पूर्ण विकसित अवस्था में दूसरों को दें।
6.    बच्चों को कोई भी नया गुण एवं कला उनकी

 रूचि अनुसार सिखाएं। अपनी रूचि को उनके ऊपर हावी न होने दें। ऐसा करने से बच्चों के दिमाग पर दबाव उत्पन्न होता है एवं वह उस कला को पूर्णता रूप से नहीं सीख पाते हैं।
आप ही खुद ही बगीचा एवं उसके माली भी हैं। बगीचे की जमीन तैयार करने का भी कार्य आपके हाथों में है, आपने जो बीज बोये हैं जैसे बीज बोये हैं-उसका वैसा ही फल आपको मिलेगा। पौधे का ध्यान रखना एवं पूर्व विकसित करना विश्व की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है - सभी पौधों को अनन्त प्रेम एवं आपके सभी त्याग के लिये विश्व के सभी मालियों को सादर प्रमाण करती हूॅ।

........प्रतिभा बोन्दिया