संतोष बोंदिया – एक परिचय

परिचय

मेरा जन्म 15 अक्टुबर 1963 को कोलकाता शहर के बडा बाजार में हुआ, मेरी माताजी का नाम सरला देवी एवं पिताजी का नाम नन्थुराम अग्र्रवाल है, मैं अपने माता-पिता की तीसरी संतान हूॅ, मेरे से बडी दो बहने कौशल्या-सरोज एवं दो छोटे भाई भगवती और संजय है।

बचपन

मेरा बचपन एक रूढ़ीवादी मध्यम श्रेणी के संयुक्त परिवार में बीता। मेरी छोटी बहन की शादी छोटी उम्र में हो गई थी। माता-पिता का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता था और दोनों बिस्तर पर ही रहने लगें। मध्यम श्रेणी रूढ़ीवादी परिवार की अपनी विचारधारा एवं कठिनाई होती है, मेरी पढने-लिखने, कुछ नया सीखने में काफी रूचि रहती थी, लेकिन बडी बहनों की शादी के बाद मुझे के घर के काम-काजों में ज्यदा समय देना पड़ता था। स्कुल के समय के बाद सुबह-संध्या का समय घर के काम-काज में ही चला जाता था फिर भी मैने कोलकाता के एक श्रेष्ठ विद्यालय से शिक्षाएतन से बारहवीं तक की शिक्षा प्राप्त की एवं प्रथम श्रेणी में उत्र्तीण हुई।
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शादी का विचार

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उस समय के विचारों में लड़कियों को ज्यादा पढ़ना-लिखना, बढना उचित नहीं समझा जाता था, उसी का शिकार मैं हुई और मेरी आगें की पढाई छुडा कर मुझे घर के काम-काजों में लगा दिया गया। उन दिनों मध्यम श्रेणी परिवार की लड़कियों की जिन्दगीं चैका-चुल्हा एवं बच्चों को संभालने तक ही सीमित थी, इसी तैयारी में मेरी शादी करने की योजना घर में बनने लगी। कुछ हद तक आज भी यही विचारधारा विद्यमान है।

शादी

अनन्त मेरी शादी 4 मार्च 1984 को झारसुगुडा शहर के निवासी श्री द्वारिका प्रसादजी बोन्दिया के पौत्र, श्रीमती शकुन्तला देवी-सीतारामजी बोन्दिया के पुत्र-सुरेश कुमाद बोन्दिया पुत्र के साथ हो गई।
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परिवार

मैनें एक पुत्र विशाल एवं दो पुत्रिया प्रतिभा एवं राधिका को जन्म दिया। मेरी शादी भी एक बड़े संयुक्त परिवार में हुई। मेरे दादा-दादी ससुर एवं उनके पांचों पुत्रों का परिवार एक साथ एक ही परिसर में रहता था। आज मैं अपनी चार पिढ़ीयों साथ-ससुर, पति, पुत्र-पुत्रवधु, बेटियों एवं पोती के साथ संयुक्त रूप से रहती हूॅ।

नयी सोच

चूंकि जैसे मैने लिखा मुझे पढ़ने-लिखने, सिखने का काफी शौक था एवं मै सिर्फ अपने लिए नहीं जीना चाहती थी। मैं परिवार समाज एवं देश के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी समझती थी और मुझे रूढ़ीवादी मध्यम श्रेणी विचारधारा के ऊपर उठकर कुछ कर गुजरना चाहती थी। मैने शिक्षा के साथ कई कलाएं सिखी, मेरे परिवार का मुझे काफी सहयोग मिला एवं मैं कुछ करने लगी। ईश्वर ने पेड-पौधे, कीट, पंतगो, पशु-पक्षी एवं जानवरों की संरचना की बाद में इन सबकी देख-रेख के लिए अपनी सबसे उत्तम सरंचना इंसान की, । उसको विवेक, बुद्धि, बल दिया, इन्सान को इन्सान से मिलकर रहने की इच्छा रखी, मैने इन्सान की तरह जीना अपना लक्ष्य बनया एवं वर्तमान डिग्री शिक्षा को उच्च शिक्षा मानने के क्रम से नहीं पड कर सही शिक्षा प्राप्त करने में समय लगाया, मैने शिक्षा के साथ-साथ कई कलायें सिखी मेने परिवार का मुझे बहुत सहयोग मिला एवं मै कुछ करने लगी।

प्रशिक्षण

मैं महिलाओं, बच्चियों को अपना ज्ञान निःशुल्क बाटने लगीं। मैने आज तक करीब 500 महिलाओं एवं बच्चों को निःशुल्क Cooking, Cold drinks, Stitching का प्रशिक्षण दिया है।

सामाजिक भागीदारी

मैने Women’s College, Sarswati Shishu Mandir, Marwari mahila samitee,Indra devi sultania memorial Institute आदि संस्थाओ में पदाधिकारी, कमेटी मेम्बर रह कर समाज के उत्थान में अपनी जिम्मेदारी निभाने की कोशीश कर रही हूॅ।
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पारिवारिक जिम्मेदारी

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मैन परिवार को भी काफी समय दिया। आज मेरे पुत्र विशाल CA(Chartered Accuntant) है वह सी.ए. की अन्तिम परीक्षा में पुरे आॅडिसा एवं छत्तिसगढ में प्रथम स्थान प्राप्त किया उसे इस उपलब्धि पर रायपुर में गोल्ड मेडल से नवाजा गया। मेरी बडी पुत्री ने इन्दौर से एग्रीकल्चर इन्जिनियरिंग की वह पूरी यूनिर्वसिटी में प्रथम स्थान प्राप्त की एवं उसके बाद एरिजोना स्टेट यूनिर्वसीटी, यू.एस.ए. से एग्री बिजनेस मेनेजमेंन्ट मंे मास्टर्स किया वहा भी वह उच्चतम नम्बर से पास हुई। मेरी छोटी पुत्री राधिका पुने में आर्किटेक्चर की पढाई कर रही है। मेरे तीनो बच्चो का पूरा केरियर प्रथम श्रैणी का रहा।

नयी दिशा

मैनें मध्यम श्रैणी की महिलाओ एवं बच्चओं के लिए कुछ करना चाहा एवं रुढीवादी सोच से उतराना चाहा। अपनी बच्चियों को उच्च शिक्षा देकर समाज में अपने ही घर में सुधार का विगुल बजाया। बच्चियाॅ सिर्फ चैका-चुल्हा एवं बच्चे पालने तक ही सिमित नहीं रहनी चाहिए। एक महिला षिक्षित होने से एक परिवार शिक्षित होता है।

विदेश यात्रा

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मैने दुनिया को देखना और समझना चाहा और इसलिए काफी विदेश यात्रा भी की है। अभी तक मैं अमेरिका, स्विजरलेण्ड, दुबई, सिंगापुर, मलेसिया एवं थाईलेण्ड आदि देशो को घूम कर समझ चूकी हूॅं।

लेखन

मैने अपने लिखने का शौक बढाया एवं लेखन करना चालू किया। विगत 15 वर्षो में मेरी कविताएं एवं लेख दैनिक जागरण, परमार्थ गौरव आदि पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही है, मैने अपने व्यक्तिगत अनुभवो को कविताओं का रुप देना आरंभ किया।

सामाजिक योगदान

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समाज का एक बड तबका निम्न एवं मध्य वर्गीय है। इनके उत्थान के लिए भी समर्थ इंसानो का पूरा सहयोग चाहिए। शिक्षा विचार के अलावा आर्थिक सहयोग की भी काफी जरुरत पड़ती है। चुकी ईश्वर ने हमे काफी समर्थ बनया है एवं समृद्धि दी है। इसलिए हम समाज के निचले तबके को आर्थिक सहयोग के लिए समर्थ है। हमने अपने इस दायित्व को भी संभाला और शिक्षा एवं समाज के उत्थान के लिए काफी आर्थिक सहयोग किया। हमने झारखण्ड लो काॅलेज, सरस्वती शिशु मन्दिर एवं कई संस्थाओ को काफी आर्थिक सहयोग किया एवं कर रहे है। उच्च प्राथमिक राजकीय विद्यालय, सरस्वती शिशु मन्दिर को स्कुल बिल्डिंग के निर्माण के लिए शहरी ईलाके में भूमि दान की। नए रास्ते के निर्माण एवं मन्दिर निर्माण के लिए भी भूमि दान में दी। हम धार्मिक अथवा किसी भी सामाजिक कार्य में तन-मन धन तीनों से सहयोग करने में विश्वास रखते है और कर रहे हैं।

कृतज्ञता

मुझे अपने परिवार एवं मित्रो को सदैव सहयोग मिला, मैं अपनी चारों ननद-नन्दोई सरोज, महेश, संजय, सुजाता, दिनेश-सविता एवं संगीता-सतीश, भांजा-आयुश शिवम् सिदेश, कान्हा, कृष्णा सुचि एवं अनुजा की भी उनके पूरे सहयोग के लिए आभारी हॅू।
मेरे पति से हर मार्ग में मेरा प्राप्त प्रोत्साहन किया एवं मेरे तीनो बच्चे ढाल की तरह मरे साथ खडे रहें। उस सबका दिल से आभार। अंतिम में मेरी पुत्र वधु वर्शा की विशेष आभारी हूॅ की वह मेरा पुरा ख्याल रखती है एवं मेरी पोती अाराबी जो एक वर्ष की है और मुझे अपने मुस्कानो से तरोताजा रखती है।
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